उजाला / दिल्ली
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई में हुए CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिसकर्मियों पर हमले के मामले में जांच अब क्राइम ब्रांच के हाथों में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान आपराधिक रिकॉर्ड वाले बताए गए 2,873 लोगों के खिलाफ अलग से कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की है। पुलिस के अनुसार, इन लोगों की पहचान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) के जरिए की गई थी। मामला 20 से 26 जुलाई के बीच जंतर-मंतर और नई दिल्ली के आसपास हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान हालात बिगड़ने पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी। पुलिस का आरोप है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिसकर्मियों पर हमला किया और सरकारी वाहनों तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। दिल्ली पुलिस के अनुसार, इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
FRS कैमरों से हुई थी 2,873 लोगों की पहचान
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में बताया था कि 20 से 26 जुलाई के बीच प्रदर्शन स्थल और आसपास के क्षेत्र में लगाए गए FRS कैमरों के जरिए 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई, जिनके खिलाफ पहले से आपराधिक रिकॉर्ड उपलब्ध था। इनमें 2,402 लोगों का रिकॉर्ड ‘क्राइम कुंडली’ और 471 लोगों का डोजियर रिकॉर्ड से संबंधित बताया गया था। पुलिस के अनुसार, पहचान किए गए लोगों में कुछ ऐसे भी थे जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं। रिपोर्टों में हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, बलात्कार और POCSO जैसे गंभीर मामलों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, केवल FRS में पहचान हो जाना किसी व्यक्ति की उस प्रदर्शन में मौजूदगी या हिंसा में उसकी भूमिका का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। पुलिस ने भी इसे जांच का एक सुराग बताया है।

अब क्राइम ब्रांच करेगी गहराई से जांच
क्राइम ब्रांच की जांच का अहम बिंदु यह होगा कि हिंसा अचानक हुई थी या इसके पीछे पहले से कोई योजना थी। पुलिस यह भी जांचेगी कि प्रदर्शन के दौरान आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग किस तरह भीड़ में शामिल हुए और हिंसा में उनकी वास्तविक भूमिका क्या थी। जांच एजेंसी सीसीटीवी फुटेज, FRS डेटा, पुलिस रिकॉर्ड और मौके पर मौजूद अन्य सबूतों का मिलान कर सकती है। पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान कुछ समूहों द्वारा पुलिस अधिकारियों को निशाना बनाए जाने और सुरक्षा उपकरण खींचने जैसी घटनाएं भी सामने आई थीं।
FRS सिस्टम पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में फेशियल रिकग्निशन सिस्टम की विश्वसनीयता को लेकर भी सवाल उठे हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि सिस्टम ने ऐसे लोगों की भी पहचान की, जो उस समय जेल में बंद थे। इसके बाद पुलिस की तकनीकी पहचान प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया कि FRS की पहचान को अंतिम सबूत नहीं माना जाएगा और कार्रवाई से पहले संबंधित व्यक्ति की मौके पर मौजूदगी का फील्ड वेरिफिकेशन किया जाना जरूरी है। यानी जांच में यह स्थापित करना होगा कि जिस व्यक्ति की पहचान सिस्टम ने की, वह वास्तव में प्रदर्शन स्थल पर मौजूद था या नहीं।
पुलिसकर्मियों और सरकारी संपत्ति को नुकसान
जुलाई के प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। पुलिस का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों के साथ हाथापाई की और उन्हें धक्का दिया। इसके अलावा सरकारी वाहनों और सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया गया। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा था कि 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी और प्रदर्शन के दौरान भीड़ नियंत्रण की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो गई थी। पुलिस के मुताबिक, जंतर-मंतर और आसपास के करीब तीन किलोमीटर क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग जमा हुए थे और सुरक्षा व्यवस्था के लिए हजारों पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।
17 FIR को लेकर क्या हुआ?
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए प्रदर्शन से संबंधित पहले दर्ज FIR को लेकर भी राहत मांगी थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने 20 से 25 जुलाई के प्रदर्शन से संबंधित 13 FIR को रद्द करने का अनुरोध किया था, जबकि 2,873 आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों के संबंध में अलग से कार्रवाई की अनुमति मांगी गई थी। अब क्राइम ब्रांच की जांच में यह स्पष्ट करने की कोशिश होगी कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा में वास्तव में कौन लोग शामिल थे, किसकी भूमिका क्या थी और क्या हिंसा किसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।
