उजाला / उत्तरप्रदेश
उत्तर प्रदेश: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने टांडा में आयोजित जनसभा के दौरान मुस्लिम समाज के राजनीतिक नेतृत्व और अधिकारों का मुद्दा उठाकर सियासी बहस तेज कर दी। उन्होंने कहा कि अब मुस्लिम समाज को दूसरों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी कतारों से नेतृत्व पैदा करना होगा। ओवैसी ने ‘अब्दुल’ और ‘दरी’ का उदाहरण देते हुए कहा कि अब यह व्यवस्था नहीं चल सकती कि अब्दुल दरी बिछाए और गांधी-नेहरू का नाम लेकर राजनीति करने वाले दूसरे लोग उस पर बैठ जाएं।
‘अब्दुल’ को अपना नेता खुद चुनना होगा: ओवैसी
जनसभा को संबोधित करते हुए ओवैसी ने मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम युवाओं में प्रतिभा और काबिलियत की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें राजनीतिक नेतृत्व में आगे बढ़ने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता। उन्होंने आरोप लगाया कि कई राजनीतिक दल मुस्लिम समाज को अपने लिए काम करने तक सीमित रखना चाहते हैं। ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समाज को अब अपनी राजनीतिक भूमिका पर नए सिरे से विचार करना होगा। केवल दूसरे दलों का समर्थन करने के बजाय उसे अपने बीच से ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहिए, जो उसके अधिकारों और समस्याओं को मजबूती से उठा सकें। उनके मुताबिक, जब तक मुसलमान अपनी कतारों से नेतृत्व तैयार नहीं करेंगे, तब तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से जुड़े सवाल बने रहेंगे। उन्होंने युवाओं से राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने और नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालने का आह्वान किया।
भाजपा के साथ सपा और कांग्रेस पर भी निशाना
ओवैसी ने अपने संबोधन में भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस को भी निशाने पर लिया। उन्होंने मुस्लिम समाज के सामने मौजूद राजनीतिक चुनौतियों और प्रतिनिधित्व के सवालों को उठाते हुए कहा कि समुदाय को अपने अधिकारों के लिए खुद आवाज बुलंद करनी होगी। उन्होंने आजादी के आंदोलन में मुस्लिम बुजुर्गों और उलमा-ए-इकराम के योगदान का जिक्र किया। ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समाज को शिकायत है कि देश की आजादी के लिए कुर्बानियां देने के बावजूद उसे संविधान की भावना के अनुरूप अधिकार और सम्मान नहीं मिला। उन्होंने इस स्थिति को बदलने के लिए राजनीतिक नेतृत्व में भागीदारी बढ़ाने की जरूरत बताई।
रामपुर और मुरादाबाद आने पर ओवैसी ने दिया जवाब
ओवैसी ने रामपुर और मुरादाबाद में उनके आने को लेकर उठने वाले सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने देश के पहले आम चुनाव और मौलाना अबुल कलाम आजाद का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1952 में मौलाना आजाद रामपुर से संसदीय चुनाव लड़े थे। ओवैसी के मुताबिक, जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें यहां से चुनाव लड़ने के लिए भेजा था। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मौलाना आजाद रामपुर से चुनाव लड़ने आए थे, तब उनके आने पर इसी तरह के सवाल क्यों नहीं उठाए गए। ओवैसी ने कहा कि मौलाना आजाद के ज्ञान और व्यक्तित्व को देखते हुए यहां के लोगों ने उन्हें चुना था। उन्होंने वर्ष 1957 में मौलाना आजाद के मेवात यानी गुड़गांव से चुनाव लड़ने का भी जिक्र किया।
दलितों और मुसलमानों के अधिकारों का मुद्दा उठाया
जनसभा में ओवैसी ने अनुसूचित जाति के लोगों और मुसलमानों के सामने मौजूद समस्याओं का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने सम्मान, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकारों की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पेट की भूख सहन की जा सकती है, लेकिन जब किसी के मान-सम्मान और इज्जत की बात आती है, तो अन्याय को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अपने भाषण में उन्होंने अस्पतालों में इलाज और दवाओं की उपलब्धता का जिक्र करते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि दलितों और मुसलमानों को जरूरी सुविधाएं मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जबकि उनके खिलाफ दमन की स्थिति पैदा हो जाती है। ओवैसी ने दोनों समुदायों से मिलकर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की।
मुस्लिम नेतृत्व पर फिर शुरू हुई सियासी बहस
टांडा की जनसभा में ओवैसी का ‘अब्दुल’ और ‘दरी’ वाला बयान मुस्लिम समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है। उनके भाषण का मुख्य संदेश यह रहा कि किसी भी समुदाय को केवल वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे अपने बीच से नेतृत्व तैयार करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। अब देखना होगा कि ओवैसी की यह अपील आगामी राजनीतिक समीकरणों में कितना प्रभाव डालती है और मुस्लिम समाज के नेतृत्व तथा प्रतिनिधित्व का सवाल उत्तर प्रदेश की सियासत में किस तरह आगे बढ़ता है।
