उत्तराखंड की ‘एक जिला दो उत्पाद’ योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई उड़ान

CM DHAMI

उजाला / उत्तराखंड

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा, पारंपरिक उत्पादों और हस्तशिल्प को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के उद्देश्य से संचालित ‘एक जिला दो उत्पाद’ योजना राज्य की स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य प्रदेश के सभी 13 जिलों के विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देना, पारंपरिक उद्योगों को नई पहचान दिलाना और स्थानीय लोगों के लिए स्वरोजगार के अवसर तैयार करना है। अक्टूबर 2021 में इस योजना से संबंधित शासनादेश जारी किया गया था।

स्थानीय उत्पादों को मिलेगा नया बाजार

उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों की अपनी विशिष्ट पहचान है। कहीं बाल मिठाई और ताम्र शिल्प जैसे पारंपरिक उत्पाद प्रसिद्ध हैं, तो कहीं पहाड़ी राजमा, शहद, मशरूम, सेब से बने उत्पाद और ऊनी हस्तशिल्प लोगों की आजीविका का आधार हैं। योजना के तहत ऐसे उत्पादों को बाजार की मांग के अनुरूप विकसित करने पर जोर दिया गया है। इसमें उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने, डिजाइन विकास, कौशल प्रशिक्षण, कच्चे माल की उपलब्धता और आधुनिक तकनीक के उपयोग जैसे पहलुओं को महत्व दिया गया है। इसका मकसद स्थानीय उत्पादों को केवल क्षेत्रीय बाजार तक सीमित रखने के बजाय बड़े बाजारों में प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाना है।

13 जिलों के उत्पादों की अलग पहचान

योजना के अंतर्गत अलग-अलग जिलों के पारंपरिक और स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर अल्मोड़ा की बाल मिठाई और ट्वीड, बागेश्वर के ताम्र शिल्प और मंडुवा बिस्कुट, देहरादून के बेकरी एवं मशरूम उत्पाद, हरिद्वार के गुड़ और शहद तथा नैनीताल की ऐपण कला और कैंडल क्राफ्ट को पहचान दिलाने पर जोर दिया गया है।

इसी तरह पिथौरागढ़ के मुनस्यारी राजमा और ऊनी उत्पाद, पौड़ी के हर्बल उत्पाद एवं लकड़ी के फर्नीचर, रुद्रप्रयाग के मंदिर आकृति वाले हस्तशिल्प और प्रसाद संबंधी उत्पाद, टिहरी की पारंपरिक नथ एवं प्राकृतिक रेशे से बने उत्पाद तथा उत्तरकाशी के सेब आधारित उत्पाद और ऊनी हस्तशिल्प भी स्थानीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इन उत्पादों की ब्रांडिंग, बेहतर पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच मजबूत होने से स्थानीय उत्पादकों को अपने काम का बेहतर मूल्य प्राप्त करने के अवसर मिल सकते हैं।

किसानों और कारीगरों के लिए रोजगार की संभावनाएं

पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों के सामने अक्सर सीमित बाजार, परिवहन की लागत और उत्पादों के उचित मूल्य जैसी चुनौतियां रहती हैं। ऐसे में स्थानीय उत्पादों को संगठित बाजार से जोड़ना किसानों, काश्तकारों, बुनकरों, कारीगरों और महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए लाभकारी हो सकता है। यदि उत्पादों की गुणवत्ता, विपणन और बिक्री व्यवस्था मजबूत होती है, तो स्थानीय स्तर पर छोटे उद्यम स्थापित करने और मौजूदा कारोबार का विस्तार करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए विकल्प विकसित करने में भी मदद मिल सकती है।

पलायन रोकने और आत्मनिर्भर उत्तराखंड की दिशा में पहल

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार की कमी लंबे समय से पलायन की प्रमुख चुनौतियों में शामिल रही है। स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्यमों को प्रोत्साहन देकर युवाओं को अपने गांव और क्षेत्र में काम करने के अवसर उपलब्ध कराना इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, योजना का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उत्पादकों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार, परिवहन और नियमित खरीदारों तक कितनी प्रभावी पहुंच मिलती है। केवल उत्पादों की पहचान पर्याप्त नहीं है; उनके उत्पादन से लेकर बिक्री तक की पूरी व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी है।

‘लोकल से ग्लोबल’ की ओर उत्तराखंड

उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने के प्रयासों में ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ जैसे साझा ब्रांड की भी भूमिका है। ऐसे मंच स्थानीय उत्पादों की पहचान, ब्रांडिंग और विपणन को एक नई दिशा दे सकते हैं।

कुल मिलाकर, ‘एक जिला दो उत्पाद’ योजना उत्तराखंड की पारंपरिक विरासत को आर्थिक अवसरों में बदलने की क्षमता रखती है। प्रभावी क्रियान्वयन, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन और मजबूत विपणन व्यवस्था के जरिए यह पहल किसानों, कारीगरों और स्थानीय उद्यमियों को आगे बढ़ाने के साथ आत्मनिर्भर उत्तराखंड के लक्ष्य को भी मजबूती दे सकती है।

 

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