उजाला / उत्तरप्रदेश
वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में आयोजित तीन दिवसीय छठी संस्कृति संसद का समापन सनातन धर्म, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संकल्पों के साथ हुआ। 3 से 5 नवंबर तक आयोजित इस आयोजन में देशभर से आए संतों, धर्माचार्यों और विभिन्न संप्रदायों के प्रतिनिधियों ने मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों को विदेशों से भारत वापस लाने, हिंदू आचार संहिता घोषित करने और धर्मांतरण पर अंकुश लगाने जैसे मुद्दों पर सहमति जताई। इन प्रस्तावों के बाद संस्कृति संसद के फैसले चर्चा का विषय बन गए हैं।
127 संप्रदायों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
संस्कृति संसद में अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती के मुताबिक, इस आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से संत और धर्माचार्य पहुंचे। कुल 127 संप्रदायों के प्रतिनिधियों सहित 1680 संतों ने पंजीकरण कराकर अपने विचार रखे। आयोजन का मुख्य उद्देश्य काशी को सनातन हिंदू धर्म की वैश्विक राजधानी के रूप में स्थापित करना और यहां से देश, समाज, धर्म तथा संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विमर्श करना था। इस बार आयोजन में भारतीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के साथ युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया। कार्यक्रम की रूपरेखा में जेन-जी संवाद, विद्वानों की परिचर्चा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी शामिल थीं।
विदेशों से वापस लाई जाएंगी मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियां
संस्कृति संसद के सबसे अहम संकल्पों में मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों को भारत वापस लाने का प्रस्ताव शामिल रहा। स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने बताया कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और विलियम जोंस के पत्रों में भारत से प्राचीन पांडुलिपियों को विदेश ले जाने का उल्लेख मिलता है। ऐसे में इन पांडुलिपियों की पहचान कर उन्हें भारत वापस लाने के लिए अगले दो वर्षों तक अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान का लक्ष्य वर्ष 2028 में आयोजित होने वाली अगली संस्कृति संसद तक इन पांडुलिपियों को भारत लाकर प्रस्तुत करना है। इसके लिए संस्कृति मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से सहयोग मांगा जाएगा। साथ ही राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन की मदद से भी प्रयास किए जाएंगे। योजना के तहत भारतीय विद्वानों का एक प्रतिनिधिमंडल विदेशों में मौजूद पांडुलिपियों का अध्ययन करेगा। काशी विद्वत परिषद के माध्यम से भी इस दिशा में संस्थागत प्रयास करने की बात सामने आई है। विदेशों में रखी प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों की पहचान और उनके मूल स्वरूप की जांच इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
मनुस्मृति में बदलाव नहीं, मूल स्वरूप की पहचान पर जोर
स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने इस अभियान को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य मनुस्मृति की समीक्षा के नाम पर उसमें बदलाव करना नहीं है। यह भारत की बौद्धिक और सांस्कृतिक संपदा को वापस लाने का प्रयास है। पांडुलिपियां भारत आने के बाद देश के विद्वान उनका अध्ययन करेंगे और उपलब्ध संस्करणों के साथ उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा। इसका मकसद मूल पाठ की प्रामाणिकता, ऐतिहासिक संदर्भ और विभिन्न संस्करणों के बीच अंतर को समझना है। यानी पांडुलिपियों की वापसी के बाद ही विद्वानों के अध्ययन के आधार पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचने की बात कही गई है।
हिंदू आचार संहिता होगी सार्वजनिक
संस्कृति संसद का दूसरा बड़ा संकल्प हिंदू आचार संहिता को लेकर रहा। आयोजन से पहले ही आयोजकों ने इसके सार्वजनिक किए जाने की जानकारी दी थी। इस संहिता का उद्देश्य हिंदू समाज में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आचरण से जुड़े विषयों पर एक साझा दिशा प्रस्तुत करना है। स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने पहले ही स्पष्ट किया था कि यह संहिता स्वैच्छिक होगी। इसे किसी व्यक्ति या समुदाय पर थोपा नहीं जाएगा। जो लोग इसके नियमों और सुझावों को स्वीकार करना चाहेंगे, वे अपनी इच्छा से ऐसा कर सकेंगे।
धर्मांतरण पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव
तीसरा महत्वपूर्ण संकल्प धर्मांतरण से जुड़ा रहा। संतों और धर्माचार्यों ने धर्मांतरण की गतिविधियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता जताई। उनका मानना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए समाज में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। इस विषय पर भी संस्कृति संसद में विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित किया गया।
2028 की संस्कृति संसद पर टिकी निगाहें
काशी में संपन्न हुई छठी संस्कृति संसद के ये तीनों संकल्प आने वाले समय में किस दिशा में आगे बढ़ते हैं, इस पर अब सबकी निगाहें रहेंगी। खास तौर पर विदेशों में मौजूद मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों को भारत वापस लाने का अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके लिए अगले दो वर्षों में सरकारी मंत्रालयों, पांडुलिपि संरक्षण से जुड़े संस्थानों और विद्वानों के सहयोग से काम करने की योजना है।
कुल मिलाकर, संस्कृति संसद ने धार्मिक विमर्श के साथ भारतीय इतिहास, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है। अब देखना होगा कि वर्ष 2028 में होने वाली अगली संस्कृति संसद तक इन संकल्पों में कितनी प्रगति होती है और मनुस्मृति की मूल पांडुलिपियों की वापसी की दिशा में क्या ठोस परिणाम सामने आते हैं।
