उजाला / देश
बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ जाने को लेकर विवाद गहरा गया है। वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज की सदस्यता पर सवाल उठने लगे हैं। जेडीयू ने इस घटनाक्रम पर विरोध जताया है, जबकि आरजेडी और जन सुराज ने दल-बदल कानून का हवाला देते हुए दोनों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई है। अब सबकी नजर बिहार विधान परिषद के सभापति के फैसले पर टिकी है।
भाजपा के साथ जाने से क्यों बढ़ा विवाद?
बिहार विधान परिषद चुनाव में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से वंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राहुल राज ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी। दोनों ने चुनाव में जनता दल यूनाइटेड (JDU) के उम्मीदवारों को हराकर विधान परिषद में अपनी जगह बनाई। चुनाव में जीत के बाद 31 अक्टूबर को दोनों नेताओं के भाजपा कार्यालय पहुंचने और पार्टी की सदस्यता लेने की खबर सामने आई। इस घटनाक्रम के बाद बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई। विपक्षी दलों ने इसे संविधान और दल-बदल कानून के खिलाफ बताते हुए सवाल उठाए। वहीं, भाजपा की ओर से बाद में स्पष्ट किया गया कि दोनों नेताओं ने पार्टी की औपचारिक सदस्यता नहीं ली, बल्कि सरकार को समर्थन देने की बात कही है।
वंशीधर ब्रजवासी ने बदला अपना रुख
इस पूरे विवाद में वंशीधर ब्रजवासी का बयान खास चर्चा में है। भाजपा कार्यालय से निकलने के बाद उन्होंने पार्टी में शामिल होने की बात कही थी। हालांकि, बाद में फेसबुक लाइव के जरिए उन्होंने भाजपा की सदस्यता लेने से इनकार कर दिया। ब्रजवासी के मुताबिक, उन्होंने सरकार को समर्थन दिया है, लेकिन वह भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने शिक्षकों की समस्याओं का समाधान करने का आश्वासन दिया है। यदि शिक्षकों के मुद्दों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती है, तो वह सरकार का विरोध भी करेंगे। दूसरी ओर, राहुल राज ने भाजपा कार्यालय में पार्टी की सदस्यता लेने की बात कही थी। बाद में भाजपा की ओर से औपचारिक सदस्यता से इनकार किए जाने के बाद इस मामले में स्थिति और उलझ गई। ऐसे में दोनों नेताओं के वास्तविक राजनीतिक रुख और पार्टी सदस्यता की स्थिति पर सवाल बने हुए हैं।
क्या कहता है संविधान और दल-बदल कानून?
इस विवाद का सबसे अहम पहलू भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची है, जिसमें दल-बदल से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 191(2) के साथ दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के तहत निर्दलीय निर्वाचित सदस्य के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने पर अयोग्यता का प्रावधान लागू हो सकता है। इसका अर्थ है कि कोई उम्मीदवार यदि निर्दलीय चुनाव जीतता है, तो चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने पर उसकी विधान परिषद की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।
हालांकि, इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर है। किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता लेना और किसी सरकार को बाहर से समर्थन देना दो अलग-अलग स्थितियां हैं। निर्दलीय सदस्य सरकार का समर्थन कर सकता है, लेकिन किसी दल में शामिल होने की स्थिति में दल-बदल कानून के प्रावधान लागू होने का सवाल उठ सकता है। इसी कानूनी अंतर के कारण इस विवाद में दोनों नेताओं की सदस्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। अंतिम निर्णय संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, उपलब्ध साक्ष्यों और सक्षम प्राधिकारी के फैसले पर निर्भर करेगा।
जेडीयू की नाराजगी ने बढ़ाई सियासी हलचल
इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों ने चुनाव में जेडीयू के उम्मीदवारों को हराया था। तिरहुत स्नातक सीट पर वंशीधर ब्रजवासी ने जेडीयू के अभिषेक झा को, जबकि सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज ने जेडीयू के आनंद पुष्कर को शिकस्त दी थी। ऐसे में दोनों नेताओं का भाजपा के करीब जाना एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के तालमेल और चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े करता है। जेडीयू की नाराजगी के बीच यह मुद्दा गठबंधन की राजनीति में भी चर्चा का विषय बन गया है।
आरजेडी और जन सुराज ने की कार्रवाई की मांग
आरजेडी ने दोनों नेताओं के भाजपा में शामिल होने के घटनाक्रम को संविधान के प्रावधानों के विपरीत बताते हुए उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग उठाई है। पार्टी का कहना है कि निर्दलीय निर्वाचित सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हो सकते। वहीं, जन सुराज की ओर से भी इस मामले को विधान परिषद के सभापति, चुनाव आयोग और जरूरत पड़ने पर न्यायालय के समक्ष उठाने की बात कही गई है। विपक्ष का तर्क है कि यदि दोनों नेताओं ने वास्तव में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है, तो इसकी जांच कर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
अब सभापति के फैसले पर टिकी निगाहें
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या वंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज ने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ली है या वे केवल सरकार को समर्थन दे रहे हैं। इसी सवाल का जवाब उनकी विधान परिषद की सदस्यता के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि औपचारिक सदस्यता के पर्याप्त साक्ष्य सामने आते हैं, तो दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का मामला उठ सकता है। दूसरी ओर, केवल समर्थन देने की स्थिति में कानूनी पहलुओं का अलग तरीके से परीक्षण करना होगा। अब बिहार विधान परिषद के सभापति के समक्ष मामला उठाए जाने और संभावित कानूनी चुनौती के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों नेताओं की सदस्यता पर क्या फैसला होता है। फिलहाल सदस्यता रद्द होने की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस विवाद ने बिहार की राजनीति में नया सियासी मोर्चा खोल दिया है।
