उजाला / उत्तराखंड
पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। जिले के प्राचीन दिंगास और कासनी मंदिरों के साथ ही नगर के मध्य स्थित ऐतिहासिक लंदन फोर्ट को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन लाने की कार्रवाई की जा रही है। इन ऐतिहासिक स्थलों का कुमाऊं के इतिहास, प्राचीन स्थापत्य कला और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष महत्व रहा है। पुरातत्व विभाग के संरक्षण में आने के बाद इन धरोहरों के व्यवस्थित अध्ययन, ऐतिहासिक साक्ष्यों के अभिलेखीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण की उम्मीद बढ़ गई है। पिथौरागढ़ जिला प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहां मौजूद प्राचीन मंदिर और ऐतिहासिक इमारतें क्षेत्र के अतीत, धार्मिक मान्यताओं और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था की जानकारी देती हैं। ऐसे में इन धरोहरों को संरक्षित करने की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
13वीं शताब्दी के दिंगास मंदिर से मिला ताम्रपत्र
पिथौरागढ़ के दिंगास स्थित प्राचीन मंदिर का ऐतिहासिक महत्व काफी अधिक है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था। मंदिर से ताम्रपत्र भी मिल चुका है, जो कुमाऊंनी भाषा में बताया जाता है। यह ताम्रपत्र क्षेत्र के प्राचीन इतिहास, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और उस समय की ऐतिहासिक गतिविधियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
प्राचीन अभिलेख किसी भी क्षेत्र के इतिहास को प्रमाणिक रूप से समझने के महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं से संबंधित जानकारियां सामने आ सकती हैं। यदि दिंगास मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में लिया जाता है, तो यहां उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के व्यवस्थित अध्ययन और दस्तावेजीकरण का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही मंदिर की स्थापत्य शैली, निर्माण तकनीक और वर्तमान संरचनात्मक स्थिति का अध्ययन भी किया जा सकेगा। इससे मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को बेहतर तरीके से समझने और भविष्य के लिए सुरक्षित रखने में मदद मिलने की संभावना है।
कासनी मंदिर में स्थापित है भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा
जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर कासनी गांव में स्थित प्राचीन मंदिर भी इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है। जिले में भगवान विष्णु के प्राचीन मंदिर अपेक्षाकृत कम होने के कारण कासनी मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से खास महत्व रखता है। मंदिर की प्रतिमा, स्थापत्य कला और इससे जुड़ी स्थानीय मान्यताएं क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपराओं को समझने में सहायक हो सकती हैं। पुरातत्व विभाग के अधीन आने के बाद मंदिर की संरचना और प्रतिमा का विशेषज्ञों के माध्यम से अध्ययन किए जाने की उम्मीद है। इसके अलावा मंदिर परिसर की मौजूदा स्थिति का आकलन कर जरूरत के अनुसार संरक्षण और मरम्मत के कार्य किए जा सकते हैं। वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण होने पर मंदिर की मूल संरचना और ऐतिहासिक विशेषताओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
नगर के बीचोंबीच स्थित लंदन फोर्ट का भी होगा संरक्षण
पिथौरागढ़ नगर के मध्य स्थित लंदन फोर्ट जिले की प्रमुख ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। इस किले का निर्माण वर्ष 1791 में हुआ बताया जाता है। नगर के बीच स्थित होने के कारण यह ऐतिहासिक इमारत पिथौरागढ़ की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लंदन फोर्ट को भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन लाने की कार्रवाई की जा रही है। विभाग के संरक्षण में आने के बाद किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, स्थापत्य विशेषताओं और वर्तमान संरचना का विस्तृत अध्ययन किया जा सकता है। इसके इतिहास से जुड़ी उपलब्ध जानकारियों का संकलन और अभिलेखीकरण भी महत्वपूर्ण होगा।
किले की संरचना को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक संरक्षण कार्य किए जाने की संभावना है। इससे समय के साथ ऐतिहासिक इमारत को होने वाले नुकसान को रोकने और उसकी मूल विशेषताओं को बचाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि, संरक्षण कार्यों और अन्य गतिविधियों का वास्तविक स्वरूप संबंधित विभाग की प्रक्रिया और आकलन पर निर्भर करेगा।
कुमाऊं के इतिहास को समझने में मिलेगी मदद
दिंगास और कासनी के मंदिरों तथा लंदन फोर्ट को पुरातत्व विभाग के संरक्षण में लेने की पहल पिथौरागढ़ की ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान दिला सकती है। इन स्थलों से जुड़े अभिलेखों, प्रतिमाओं, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक तथ्यों का व्यवस्थित अध्ययन होने पर कुमाऊं के अतीत से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आने की संभावना है। इन धरोहरों का संरक्षण केवल पुरानी इमारतों और मंदिरों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का भी माध्यम है। यदि संरक्षण की प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है, तो पिथौरागढ़ की विरासत को सुरक्षित रखने के साथ ही क्षेत्र में ऐतिहासिक पर्यटन और सांस्कृतिक अध्ययन को भी प्रोत्साहन मिल सकता है।
फिलहाल इन तीनों धरोहरों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन लाने की कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रक्रिया पूरी होने और संरक्षण संबंधी योजनाएं तय होने के बाद इनके ऐतिहासिक महत्व को सामने लाने तथा सुरक्षित रखने की दिशा में आगे के कदम स्पष्ट होंगे।
