उजाला / उत्तरप्रदेश
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीतियां तैयार कर रहे हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के 31 अक्टूबर को वाराणसी के रोहनिया विधानसभा क्षेत्र से चुनावी अभियान की शुरुआत करने की संभावना चर्चा में है। एबीपी लाइव की 20 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, रैली की तैयारियों को लेकर स्थानीय स्तर पर गतिविधियां तेज होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, सपा की ओर से इस कार्यक्रम की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
सरदार पटेल जयंती पर आयोजन के सियासी मायने
31 अक्टूबर को देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती मनाई जाती है। इसे राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। कुर्मी समाज में सरदार पटेल का विशेष सम्मान होने के कारण इस अवसर पर संभावित रैली को सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संदेश से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने वाराणसी पहुंचकर स्थानीय नेताओं के साथ बैठक की थी। इसके बाद रोहनिया में संभावित आयोजन को लेकर चर्चाएं तेज हुईं। हालांकि, बैठक और रैली के उद्देश्य को लेकर पार्टी की ओर से आधिकारिक जानकारी सामने आना बाकी है।
कुर्मी समाज और ओबीसी राजनीति का समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। विभिन्न राजनीतिक आकलनों में प्रदेश की आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी करीब 4 से 5 प्रतिशत बताई जाती है। राजनीतिक विश्लेषणों के मुताबिक, प्रदेश की लगभग 50 से 60 विधानसभा सीटों पर कुर्मी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, जबकि करीब 130 सीटों पर समुदाय की मौजूदगी का उल्लेख किया जाता है। हालांकि, इन आंकड़ों को आधिकारिक जातिवार जनगणना के प्रमाणित आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।कुर्मी समाज की राजनीतिक उपस्थिति पूर्वांचल, अवध, रुहेलखंड और बुंदेलखंड के कई हिस्सों में मानी जाती है। महाराजगंज, संत कबीर नगर, बस्ती, बाराबंकी, प्रतापगढ़, कौशांबी, प्रयागराज, मिर्जापुर, सोनभद्र और बरेली जैसे जिलों में इस समुदाय के मतदाता विभिन्न चुनावों में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।
सपा की पीडीए रणनीति के लिए क्यों अहम है रोहनिया?
समाजवादी पार्टी की राजनीति में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों को साथ लाने की रणनीति महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में गैर-यादव ओबीसी समुदायों तक पहुंच बढ़ाना पार्टी की चुनावी तैयारियों का एक प्रमुख पहलू माना जा रहा है। कुर्मी समाज का समर्थन विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ रहा है। भाजपा और अपना दल (एस) का भी इस समुदाय के बीच राजनीतिक आधार है। वहीं, समाजवादी पार्टी में भी कुर्मी समुदाय से आने वाले नेता मौजूद हैं। इसलिए किसी एक दल के पक्ष में पूरे समुदाय के समर्थन को एकसमान मानना सही नहीं होगा।
भाजपा की तैयारी से भी बढ़ी राजनीतिक हलचल
सरदार पटेल जयंती को लेकर भाजपा ने भी उत्तर प्रदेश में कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की है। एबीपी लाइव की 20 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा पिछड़ा वर्ग मोर्चा प्रदेश के 98 संगठनात्मक जिलों में जयंती के कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहा है।इससे स्पष्ट है कि जयंती के आयोजन को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां बढ़ रही हैं। हालांकि, इन कार्यक्रमों के उद्देश्य और स्वरूप में अंतर हो सकता है।
पूर्वांचल पर रहेगी नजर
वाराणसी का रोहनिया विधानसभा क्षेत्र संभावित रैली के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां से आयोजित किसी बड़े कार्यक्रम का संदेश मिर्जापुर, सोनभद्र और चंदौली जैसे आसपास के जिलों तक पहुंच सकता है। ऐसे में 31 अक्टूबर का संभावित आयोजन सपा की पूर्वांचल में राजनीतिक गतिविधियों का हिस्सा हो सकता है। फिलहाल, रैली की तारीख, स्थान और स्वरूप को लेकर आधिकारिक घोषणा का इंतजार है। यदि अखिलेश यादव यहां सभा करते हैं, तो उनके भाषण, उठाए जाने वाले मुद्दों और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर दिए जाने वाले संदेश पर राजनीतिक नजर रहेगी। 2027 के चुनाव से पहले यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि सपा की पीडीए रणनीति में कुर्मी समाज को किस तरह स्थान दिया जाता है।
